INDEX: KYA, KYUN AUR KAISE?

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इण्डेक्स किसी भी पुस्तक की आत्मा होती है । उसे देख कर आसानी से समझा जा सकता है कि पुस्तक में क्या है यानि विषय का प्रतिपादन किस प्रकार किया गया है । फिर भी हिन्दी जगत में इण्डेक्सिंग के संबंध में मुख्य बात यह है कि न तो लेखक और न प्रकाशक ही अपनी पुस्..

इण्डेक्स किसी भी पुस्तक की आत्मा होती है । उसे देख कर आसानी से समझा जा सकता है कि पुस्तक में क्या है यानि विषय का प्रतिपादन किस प्रकार किया गया है । फिर भी हिन्दी जगत में इण्डेक्सिंग के संबंध में मुख्य बात यह है कि न तो लेखक और न प्रकाशक ही अपनी पुस्तकों में इण्डेक्स का होना आवश्यक समझते हैं जब कि उनके द्वारा प्रकाशित अंग्रेज़ी पुस्तकों में इण्डेक्स दी जाती है । कहा जाता है कि हिन्दी में इंडेक्स बनाने वाले नहीं हैं । पुस्तकालय विज्ञान के विद्यार्थियों को भी इण्डेक्सिंग के संबंध में कोई विशेष शिक्षा नहीं दी जाती है, व्यावहारिक शिक्षा तो बिलकुल ही नहीं । देश में, विशेषकर हिन्दी में ऐसे बहुत कम व्यक्ति हैं जिन्हें इण्डेक्सर यानि अनुक्रमणिका बनाने वाला कहा जाए । ऐसी स्थिति में हिन्दी पुस्तकों में इण्डेक्स का न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । यह पुस्तक इसी कमी की पूर्ति करती है । हिन्दी में यह इस विषय की संभवत% पहली पुस्तक है जिसमें इण्डेक्सिंग के सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया गया है यानि इण्डेक्स क्या है, क्यों बनाई जानी चाहिए और कैसे बनाई जाती है । पुस्तकों की इण्डेक्स, पत्र–पत्रिकाओं की इण्डेक्स, समाचारपत्रों की इण्डेक्स, समेकित इण्डेक्स और उनके लिए सही विषय शीर्षक का चुनाव, अंतर्संदर्भ यानि देखिये तथा और देखिये का प्रयोग, विराम चिह्नों का सही प्रयोग आदि सभी बातों को सहज, सरल भाषा में समझाया गया है । पाठकों की सहायता के लिए पुस्तक के अंत में इस पुस्तक की इण्डेक्स भी दी गयी है ।

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