Nariwadi Aalochana

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व्यवस्था से विद्रोह की घोषणा के साथ पैदा हुआ स्त्री–विमर्श स्वयं बाजार का हिस्सा बनता जा रहा है । यह लेखन के बाजार का प्रिय विषय बन चुका है । लेखक और प्रकाशक दोनों बड़ी तत्परता से ज्यादा से ज्यादा किताबें तैयार करने में जुटे हैं । इस अ/िाकता से पाठक क..

व्यवस्था से विद्रोह की घोषणा के साथ पैदा हुआ स्त्री–विमर्श स्वयं बाजार का हिस्सा बनता जा रहा है । यह लेखन के बाजार का प्रिय विषय बन चुका है । लेखक और प्रकाशक दोनों बड़ी तत्परता से ज्यादा से ज्यादा किताबें तैयार करने में जुटे हैं । इस अ/िाकता से पाठक किम्कर्तव्यविमूढ़ हो गया है कि क्या पढ़े और क्या छोड़े ? अब तो यह पहचानने में भी मुश्किल होने लगी है कि कौन सा और किसका लेखन नारीवादी है । नारीवाद की परिभाषा क्या है, और हिन्दी में नारीवाद की शुरुआत कब होती है, नारीवाद का सौन्दर्य शास्त्र क्या है और नारीवाद को मुक्ति किससे चाहिए ? भ्रम की इस स्थिति का निवारण नारीवादी आलोचना के जिम्मे था, लेकिन वह स्वयं गतिरो/ा का शिकार हो गयी है कारण कि एक ही नारीवादी आलोचक के पैमाने अलग–अलग लेखकों या कृतियों के संदर्भ में बदल–बदल जाते हैं । इन चुनौतियों से टकराने की एक कोशिश है यह किताब । इस किताब में हिन्दी की नारीवादी आलोचना की मौजूद समस्याओं की न सिर्फ सटीक पहचान की गई है बल्कि उनकी पूर्वाग्रह मुक्त आलोचना भी इसमें की गई है । नारीवादी आलोचना की मौलिक और संतुलित दृष्टि से पड़ताल करते हुए यह किताब हिन्दी में नारीवाद की एक नई पढ़त की नजर विकसित करती है ।

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