Kala Ki Duniya Mein (Paperback)

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देश–विदेश के कला–संग्रहालयों में जाने के और कलाकारों से मित्रता और अंतरंगता के किस्से तो इस पुस्तक की प्राय: सभी टिप्पणियों और लेखों में पिरोये हुए हैं । उन पर अलग से और क्या जोड़ूँ । इतना ही और कहना चाहता हूँ कि ‘कल्पना’ ‘दिनमान’ से जो सीख मिली थी कि..

देश–विदेश के कला–संग्रहालयों में जाने के और कलाकारों से मित्रता और अंतरंगता के किस्से तो इस पुस्तक की प्राय: सभी टिप्पणियों और लेखों में पिरोये हुए हैं । उन पर अलग से और क्या जोड़ूँ । इतना ही और कहना चाहता हूँ कि ‘कल्पना’ ‘दिनमान’ से जो सीख मिली थी कि सभी कलाओं में रुचि लो, तो उससे आनंद तो आएगा ही, किसी विषय पर लिखना भी सुगम होगा,—उसका अनुभव किया है—इस पुस्तक की सामग्री लिखते हुए । ---प्रयाग शुक्ल कवि, कथाकार, निबंधकार के समानांतर कला–लेखक/समीक्षक के रूप में भी प्रयाग जी की सक्रियता पिछली आधी सदी से ज्यादा की रही है । इस लंबे अंतराल में कलाओं की बहुरंगी दुनिया को देखते–परखते, निरंतर लिखते हुए उन्होंने कला–लेखन की अपनी एक शैली विकसित की है, जिसमें पारंपरिक भारतीय लघुचित्रों–सा सम्मोहन है और ललित निबंध जैसी मिठास । प्रयाग जी के कला–लेखन में सहजता का सौंदर्य है, सतत जिज्ञासा और विस्मय का भावबोध है । वे किसी भी घटना, संस्मरण या किसी साधारण–से वाकये से अपनी बात शुरू करते हैं फिर धीरे–धीरे गहराई में उतरते चले जाते हैं । तथ्यों और विचारों की काव्यात्मक तर्कसंगति, आत्मीयता–भाव और समन्वय से उनका कला–लेखन भीड़ में अलग खड़ा दिखता है । इस पुस्तक में शामिल आलेखों/टिप्पणियों में प्रयाग जी ने करीब 55 बरसों की दीर्घ अवधि में अनेक पीढ़ियों, अलग–अलग मन–मिजाज के कलाकारों की कला की गहराई में उतर कर जिस सहज ढंग से व्याख्या/विश्लेषण किये हैं, समकालीन कला से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों और प्रवृत्तियों को जिस खुले मन से देखा–परखा है, वह काबिलेगौर है । -_____अभिषेक कश्यप

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