Mai Tumhara Aaina (HB)

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  • Product Code:ISBN: 978-9382554745
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एक बार फिर इन चंद रचनाओं के साथ आपके सामने हूँ । मेरे पास एक आइना है वैसा ही जैसा आपके पास है । हम सभी इस आइने में अपने समय की सच्चाइयों को रीझना-बूझना चाहते हैं । दूसरे शब्दों में कहें तो हम जीवन को अपने-अपने आइने में परिभाषित करना चाहते हैं----- अप..

एक बार फिर इन चंद रचनाओं के साथ आपके सामने हूँ । मेरे पास एक आइना है वैसा ही जैसा आपके पास है । हम सभी इस आइने में अपने समय की सच्चाइयों को रीझना-बूझना चाहते हैं । दूसरे शब्दों में कहें तो हम जीवन को अपने-अपने आइने में परिभाषित करना चाहते हैं----- अपनी सारी क्षमताओं और सीमाओं के साथ! किन्तु अकथ और अगेय भला कहीं किसी के आने में समा सका है ? हर बार कोशिश होती है कि भोगे हुए अनुभवों को Üाृंखला में हम जीवन-सत्य को बाँध पाएँ किन्तु हर बार वह इन Üाृंखलाओं को तोड़कर दूर खड़ा मुस्कराता हुआ मिलता है । शायद इसीलिए बार-बार रचना-कर्म की आवश्यकता महसूस होती है । मैं आपका आइना हूँ जिसमें आप अपने को मेरी सीमाओं में देख और महसूस कर सकते हैं । आप मेरा आइना हैं जिससे मैं आपकी सीमाओं को आकार पाता हूँ । क्या आपको नहीं लगता कि आइना देखने और दिखाने का यह क्रम ही जीवन के किसी व्यापक अर्थ की तलाश को छटपटाहट के साथ रेखांकित करता है । तो चलिए देखा जाए कि इस आइने में क्या-क्या, किस-किस रूप में नजर आता है । जो नजर आता है उस पर आप रीझ और खीझ तो सकते हैं पर कन्नी काट कर नहीं निकल सकते आखिर मेरा आपका एक रिश्ता है-बिम्ब-प्रतिबिम्ब का रिश्ता । यह रिश्ता मुझे और आपको भाव से महाभाव की ओर ले जाता है । हम यह क्यों भूलें कि इस आइने में जो कुछ दीख पड़ता है । वह हूबहू नहीं होता । वाम दक्षिण हो जाता है और दक्षिण वाम । यानी स्थितियाँ बदल जाती हैं इसलिए हम अपने को बदली हुई परिस्थितयों के साथ पहचानने लगते हैं । यह आइना आपका है । इसमें मैं भी हूँ आप भी हैं । इस आइने में जो नहीं समा सका चलिए मिलकर उसकी तलाश के लिए निकलते हैं ।

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