Raja Kalasya Karanam

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  • Product Code:ISBN: 978-9385450723
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महाराजा दीवानखाने में विचारमग्न स्थिति में बैठे थे । महाराजा के निजी मुंशी जी नागेश पांडुरंग भिडे कुछ दस्तावेजों पर महाराजा की दस्तखत लेने हाजिर हुए । उन्होंने हल्की खाँसी की आवाज" की । महाराजा चैंक गए । "अरे, आप ?" कहकर उन्होंने सामने देखा तो उन्हें..

महाराजा दीवानखाने में विचारमग्न स्थिति में बैठे थे । महाराजा के निजी मुंशी जी नागेश पांडुरंग भिडे कुछ दस्तावेजों पर महाराजा की दस्तखत लेने हाजिर हुए । उन्होंने हल्की खाँसी की आवाज" की । महाराजा चैंक गए । "अरे, आप ?" कहकर उन्होंने सामने देखा तो उन्हें दीवान सबनीस जी दिखाई दिए । "हम आप ही की राह देख रहे थे ।" "क्यों ?" "अन्दर चलिए, बताते हैं ।" तीनों अन्दर के कमरे में आए । "क्या बात है, हुजूर चिन्ता में डूबे हैं ?" दीवान जी ने पूछा । "बात ऐसी है दीवानजी । आप जानते हैं हमने अपने निजी मन्दिर के ब्राह्मण पुरोहित को निकालकर वहाँ मराठा पुरोहित को नियुक्त किया है--- ।" "पर हुजूर, इसे तो करीबन एक-डेढ़ महीना हुआ होगा!" "हाँ । हम आज तक राह देखते रहे कि हमारे अन्त%पुर में भी यही परिवर्तन होगा--- पर अभी तक तो ब्राह्मण पुरोहित ही पूजा-पाठ करने आता-जाता है---" "हुजूर क्रोध न करें । पर यह सालों के पुराने, दृढ़ संस्कार हैं, इतनी कम अवधि में---" "मुन्शी जी, आप सनातन कुप्रथा की पैरवी कर रहे हैं ?" "हुजूर गलत समझ रहे हैं, मैं कुप्रथा की पैरवी नहीं कर रहा हूँ । दृढ़ संस्कारों की बात कर रहा हूँ । क्षमा करें धृष्टता की ।" "कोई बात नहीं । हमारा विचार है कि रानीसाहिबा के पास सन्देश भिजवाकर कहें कि वे मराठा पुरोहित की नियुक्ति करें---"

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