Vikalpheenta Ka Dansh

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पत्रकार-सम्पादक अपूर्व जोशी ने अपनी इस पुस्तक 'विकल्पहीनता का दंश' में इस मुद्दे की चीरा-फाड़ी शिद्दत के साथ करने की कोशिश की है । काँग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से लेकर वर्तमान सरकार की राजनीतिक-आर्थिकी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपूर्व जोशी ने अपन..

पत्रकार-सम्पादक अपूर्व जोशी ने अपनी इस पुस्तक 'विकल्पहीनता का दंश' में इस मुद्दे की चीरा-फाड़ी शिद्दत के साथ करने की कोशिश की है । काँग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से लेकर वर्तमान सरकार की राजनीतिक-आर्थिकी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपूर्व जोशी ने अपने विचारों का एक कोलाज पुस्तक में तैयार किया है । विकल्पहीनता का दंश स्वत% व्याख्यायित है कि किस प्रकार भारतीय जन को राजनीतिक-आर्थिक तंत्र ने विभिन्न नारों से ठगा है । इस दृष्टि से किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, लेखक ने उसे बख्शा नहीं है । भूमण्डलीकरण एक स्वतंत्र प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसके साथ कई प्रक्रियाएँ भी इसमें निहित है । मसलन उदारीकरण, निजीकरण, विनिवेशीकरण और सांस्कृतिक परिवर्तन । लेखक ने इन प्रक्रियाओं से जन्में विद्रूताओं को पकड़ने का प्रयास किया है । यह भी समझने की कोशिश की है कि आज भारतीय राष्ट्र राज्य किस प्रकार की त्रासदी के मुहाने पर खड़ा है । नि%सन्देह अपूर्व जोशी ने राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थापकों को चेतावनी दी हैं कि किस प्रकार देश सामाजिक-धार्मिक धुव्रीकरण के राह पर चल रहा है । इस सन्दर्भ में लेखक ने संघ व भाजपा के कर्णधार नरेन्द्र मोदी को कठघरे में खड़ा किया है । लेखक का यह मानना है कि मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी गुजरात में शासक के रूप में रहे लेकिन उसका एक समतावादी विकास नहीं कर सके । ऐसे व्यक्ति से राष्ट्रीय स्तर पर समन्वयवादी विकास की आशा कैसे की जा सकती है । राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मोदी जी के जिस कंधे पर सवार होकर एक अखण्ड भारत का सपना देख रहा है, यह रास्ता तो उ/ार नहीं जाता बल्कि खतरनाक बिन्दु पर ले जाकर छोड़ देता है ।

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