Adivasi Aur Hindi Upanyas (PB)

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  • Product Code:ISBN: 978-9385450075
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जब सरकार को लगा कि संप सभा के धूणी धाम जागृति का केन्द्र बनते जा रहे हैं और आदिवासियों के मध्य फैल रही जागृति का मतलब सिर्फ उनकी आंतरिक समस्याओं के प्रति जागरुकता तक सीमित न होकर राज के शोषण के खिलाफ चेतना फैलाने तक है तो उसने दमन की नीति अपना ली । ज..

जब सरकार को लगा कि संप सभा के धूणी धाम जागृति का केन्द्र बनते जा रहे हैं और आदिवासियों के मध्य फैल रही जागृति का मतलब सिर्फ उनकी आंतरिक समस्याओं के प्रति जागरुकता तक सीमित न होकर राज के शोषण के खिलाफ चेतना फैलाने तक है तो उसने दमन की नीति अपना ली । जागृति के केन्द्र धूणी धामों को नष्ट करना शुरू कर दिया गया । थावरा गोविंद गुरू को अपराधी जनजाति अधिनियम या जरायमपेशा कानून (1871) के माध्यम से किये जा रहे दमन के बारे में बताते हुए कहता है, 'जरायम पेशा कानून के तहत संप सभा के कार्यकर्त्ताओं को जागीरदारों व पुलिस द्वारा तंग किये जाने जैसी सूचनाएं इधर-उधर मिली हैं । निर्दाेष लोगों को बिना वजह इस कानून के तहत थानों व चैकियों में बुलाया जाता है । उन पर चोरी व लूट के झूठे मुकदमे लगाकर गिरफ्तार करके जुल्म ढाये जा रहे हैं । संप सभा के कार्यकर्ताओं के मनोबल को गिराने के लिए उन्हें थाना-चैकियों में बुलाकर उल्टे-सीधे सवाल पूछे जाते हैं और देर-देर तक वहाँ बिठा लिया जाता है ।'

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